भक्ति काव्य व भजन बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

तेरा लख-लख शुक्र करा भजन इन हिंदी

पढ़ें तेरा लख-लख शुक्र करा भजन इन हिंदी का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

"तेरा लख-लख शुक्र करां" (Tera Lakh Lakh Shukar Kara) सनातन भक्ति परंपरा का एक अत्यंत लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी शुकराना भजन है। यह भजन मुख्य रूप से आदि शक्ति मां दुर्गा (विशेषकर मां झंडेवाली) और परमेश्वर के प्रति अटूट कृतज्ञता, पूर्ण शरणागति और निश्छल प्रेम को अभिव्यक्त करता है। इस भजन का मुख्य भाव 'शुकराना' यानी धन्यवाद ज्ञापन है, जो साधक को अहंकार से मुक्त कर परमात्मा की असीम अनुकंपा का अहसास कराता है। जब कोई भक्त अपने जीवन के हर सुख-दुख को ईश्वर का प्रसाद मानकर स्वीकार करता है, तब उसके अंतर्मन से यही मधुर पुकार उठती है। यह भजन न केवल नवरात्रों, जगरातों और माता की चौकी जैसे पावन अवसरों पर गाया जाता है, बल्कि दैनिक प्रार्थना और सत्संगों में भी साधकों के हृदय को झंकृत करता है। इस लेख में हम इस दिव्य भजन के सम्पूर्ण लिरिक्स, पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और शास्त्रीय संदर्भों का विस्तृत विवेचन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ तेरा लख-लख शुक्र करां ॥

(स्थायी)
तेरा लख-लख शुक्र करां, ओ मां झंडेवालिये,
तेरा लख-लख शुक्र करां, ओ मां झंडेवालिये।
मैनूं जो कुछ भी तू दित्ता, मेरी औकात तों वध के दित्ता,
तेरा लख-लख शुक्र करां, ओ मां झंडेवालिये॥

(अंतरा - 1)
कदे सोच्या नहीं सी मैं, जो तू झोली पा दित्ता,
मैनूं फर्श तों उठा के, अर्श ते बिठा दित्ता।
मेरी बांह फड़ के तू दित्ता, मेरी औकात तों वध के दित्ता,
तेरा लख-लख शुक्र करां, ओ मां झंडेवालिये॥

(अंतरा - 2)
मैनूं चरणां नाल ला के, मेरी बिगड़ी बना दित्ती,
मेरी सूनी सी जिंदगी, खुशियां नाल सजा दित्ती।
मैनूं नाम दा दान तू दित्ता, मेरी औकात तों वध के दित्ता,
तेरा लख-लख शुक्र करां, ओ मां झंडेवालिये॥

(अंतरा - 3)
लोकी ताने मारदे सी, मैनूं जग तों सताया सी,
ओस वेले शेरावालिये, तू ही गले नाल लाया सी।
मैनूं जग विच मान तू दित्ता, मेरी औकात तों वध के दित्ता,
तेरा लख-लख शुक्र करां, ओ मां झंडेवालिये॥

(अंतरा - 4)
हुण हर पल याद करां, तेरी महिमा गांदा रवां,
तेरे दर ते आके मां, मैं शीश झुकांदा रवां।
मैनूं चरणां दा प्यार तू दित्ता, मेरी औकात तों वध के दित्ता,
तेरा लख-लख शुक्र करां, ओ मां झंडेवालिये॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन भक्त और भगवान के बीच के उस परम संबंध को दर्शाता है जहां याचना (मांगने की प्रवृत्ति) समाप्त हो जाती है और केवल कृतज्ञता शेष रह जाती है। भजन का मुख्य संदेश यही है कि मनुष्य को अपने जीवन में जो कुछ भी प्राप्त हुआ है, वह उसकी स्वयं की योग्यता से नहीं, बल्कि ईश्वर की असीम कृपा का परिणाम है।

भजन की शुरुआत में भक्त कहता है कि "हे मां झंडेवाली! मैं तेरा लाख-लाख धन्यवाद करता हूँ। तूने मुझे जो कुछ भी दिया है, वह मेरी योग्यता और सामर्थ्य से कहीं अधिक है।" यह पंक्ति साधक के भीतर छिपे सूक्ष्म अहंकार को नष्ट करती है। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि हमारी उपलब्धियां हमारी नहीं बल्कि ईश्वर की देन हैं, तो हमारा मन शांत और विनम्र हो जाता है।

आगे के अंतराओं में भक्त अपनी दीनता और मां की दयालुता का वर्णन करता है। वह कहता है कि जब संसार के लोगों ने उसे ठुकरा दिया था, तब मां ने उसे गले से लगाया। फर्श (धूल) से उठाकर अर्श (ऊंचाइयों) पर बिठाने का अर्थ है कि मां ने भक्त को सामाजिक और आध्यात्मिक दोनों ही स्तरों पर सम्मान और शांति प्रदान की। यह भजन केवल भौतिक सुखों के लिए नहीं, बल्कि 'नाम दान' और 'चरणों के प्यार' जैसे आध्यात्मिक उपहारों के लिए भी मां का आभार व्यक्त करता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • कृतज्ञता का भाव (Gratitude): आधुनिक मनोविज्ञान और प्राचीन अध्यात्म दोनों ही मानते हैं कि कृतज्ञता (Gratitude) मानसिक शांति और आत्मिक उन्नति का सबसे बड़ा साधन है। यह भजन इसी भाव को सुदृढ़ करता है।
  • अहंकार का विसर्जन: "औकात तों वध के दित्ता" (मेरी योग्यता से अधिक दिया) कहकर भक्त अपने कर्तापन के अहंकार को मां के चरणों में समर्पित कर देता है।
  • शरण्य भाव: जब संसार के लोग ताने मारते हैं और संकट के समय साथ छोड़ देते हैं, तब केवल जगदम्बा ही भक्त की बांह पकड़कर उसे सहारा देती हैं।
  • भक्ति रस का प्रवाह: यह भजन पंजाबी मिश्रित हिंदी भाषा में होने के कारण अत्यंत मधुर और गाने में सरल है, जिससे यह सीधे श्रोताओं के हृदय को स्पर्श करता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि ईश्वर की आराधना और शुकराना करने का कोई निश्चित समय नहीं होता, फिर भी इस भजन के गायन और श्रवण के लिए निम्नलिखित समय और विधियां अत्यंत फलदायी मानी गई हैं:

  • नवरात्रि उत्सव: चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रों के दौरान इस भजन का गायन देवी मां को अत्यंत प्रिय है।
  • माता की चौकी और जगराता: किसी भी मांगलिक कार्य के अवसर पर आयोजित होने वाली माता की चौकी या संकीर्तन में इस भजन को शुकराने के रूप में गाया जाता है।
  • दैनिक संध्या आरती: संध्याकाल में मां की प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक जलाकर इस भजन का पाठ करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • गायन की विधि: इस भजन को गाते समय मन में पूर्ण समर्पण और कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। तालियों की थाप और ढोलक की मधुर ध्वनि के साथ सामूहिक रूप से गाने पर इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से मां झंडेवाली (आदि शक्ति दुर्गा का एक स्वरूप) को समर्पित है। दिल्ली में स्थित ऐतिहासिक 'झंडेवाला देवी मंदिर' इस स्वरूप की आराधना का मुख्य केंद्र है। मां झंडेवाली को भक्तों के कष्टों का निवारण करने वाली और उन्हें अभय वरदान देने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है।

सनातन परंपरा में मां दुर्गा को केवल संहारक के रूप में ही नहीं, बल्कि एक करुणामयी माता के रूप में भी देखा जाता है जो अपने बच्चों की हर पुकार सुनती हैं। इस भजन के माध्यम से भक्त अपनी उसी करुणामयी मां के प्रति अपना स्नेह और आभार प्रकट करता है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन उत्तर भारत की समृद्ध संकीर्तन और जगराता परंपरा से निकला है। पंजाबी और हिंदी के सुंदर समन्वय से सजे इस भजन को कई प्रसिद्ध भजन गायकों (जैसे नरेंद्र चंचल जी, लखबीर सिंह लख्खा जी) ने अपनी सुरीली आवाज देकर जन-जन तक पहुंचाया है। इसकी पृष्ठभूमि में वह लोक-संस्कृति है जहां भक्त अपने आराध्य को बहुत निकट मानता है और उनसे सीधे संवाद करता है। यह भजन किसी शास्त्रीय जटिलता से दूर, सीधे हृदय की सरल और सहज भाषा में रचा गया है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा पंजाबी मिश्रित हिंदी (खड़ी बोली) है। यह शैली उत्तर भारत के लोक भजनों में अत्यंत लोकप्रिय है।

  • काव्य रूप: यह एक मुक्तक गीत या पद है जिसमें एक स्थायी (मुखड़ा) और चार अंतरे हैं।
  • अलंकार और बिंब: इसमें "फर्श तों उठा के अर्श ते बिठाना" जैसे सुंदर मुहावरों और बिंबों का प्रयोग किया गया है, जो भक्त की सामाजिक और मानसिक स्थिति में आए सकारात्मक बदलाव को दर्शाते हैं।
  • लय और ताल: यह भजन कहवा या दादरा ताल पर अत्यंत सहजता से गाया जा सकता है। इसकी गति मध्यम से तीव्र की ओर बढ़ती है, जो अंत में साधक को नृत्य करने पर विवश कर देती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें व्यावहारिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:

  1. संतोष और आनंद: जो व्यक्ति हर परिस्थिति में ईश्वर का धन्यवाद करता है, वह कभी अवसाद (Depression) या तनाव का शिकार नहीं होता।
  2. सच्चा सहारा केवल ईश्वर है: संसार के लोग स्वार्थ के वश में होकर संबंध बनाते हैं, लेकिन ईश्वर का प्रेम निस्वार्थ और शाश्वत है।
  3. विनम्रता: अपनी सफलताओं का श्रेय स्वयं लेने के बजाय ईश्वर को देने से व्यक्ति में शालीनता और विनम्रता आती है।
  4. नाम संकीर्तन की महिमा: "नाम दा दान" को सबसे बड़ा दान माना गया है, क्योंकि यही मनुष्य को मोक्ष के मार्ग पर ले जाता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
लख-लख लाख-लाख (अनंत बार) अनंत कृतज्ञता व्यक्त करना।
शुकरां धन्यवाद / आभार ईश्वर के प्रति कृतज्ञता की भावना।
दित्ता दिया परमात्मा द्वारा प्रदत्त कृपा।
औकात तों वध के योग्यता से अधिक यह स्वीकार करना कि हम इस कृपा के पात्र नहीं थे, फिर भी ईश्वर ने दया की।
फर्श तों अर्श धूल से आसमान तक दीन-हीन अवस्था से उठाकर उच्च स्थान प्रदान करना।
बांह फड़ के हाथ पकड़कर संकट के समय ईश्वर द्वारा दिया गया सहारा।
नाम दा दान गुरु मंत्र या नाम स्मरण आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च प्राप्ति।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: तेरा लख-लख शुक्र करां, ओ मां झंडेवालिये... मैनूं जो कुछ भी तू दित्ता, मेरी औकात तों वध के दित्ता...
भावार्थ: हे मां! मैं आपका बारंबार धन्यवाद करता हूँ। आपने मुझे जीवन में जो सुख, समृद्धि, शांति और भक्ति प्रदान की है, वह मेरी पात्रता से बहुत अधिक है। यह आपकी अकारण करुणा का ही फल है।

पंक्ति: कदे सोच्या नहीं सी मैं, जो तू झोली पा दित्ता... मैनूं फर्श तों उठा के, अर्श ते बिठा दित्ता...
भावार्थ: मैंने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि मुझे जीवन में इतनी खुशियां मिलेंगी। जब मैं असहाय और निराश था, तब आपने मुझे समाज में सम्मानजनक स्थान और आत्मिक शांति प्रदान की।

पंक्ति: मैनूं चरणां नाल ला के, मेरी बिगड़ी बना दित्ती... मेरी सूनी सी जिंदगी, खुशियां नाल सजा दित्ती...
भावार्थ: जैसे ही मैंने आपके चरणों की शरण ली, मेरे जीवन के सभी बिगड़े काम बन गए। मेरी नीरस और सूनी जिंदगी खुशियों और भक्ति के रंगों से सराबोर हो गई।

पंक्ति: लोकी ताने मारदे सी, मैनूं जग तों सताया सी... ओस वेले शेरावालिये, तू ही गले नाल लाया सी...
भावार्थ: जब दुनिया के लोगों ने मेरी असफलताओं पर मेरा उपहास उड़ाया और मुझे प्रताड़ित किया, तब हे सिंहवाहिनी मां! आपने अपनी ममतामयी भुजाओं में मुझे समेट लिया और मुझे संबल दिया।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के शुकराने के भाव को पुष्ट करने के लिए देवी भागवत और श्री दुर्गा सप्तशती के निम्नलिखित श्लोक का स्मरण करना अत्यंत कल्याणकारी है:

"सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तु ते॥"

अर्थ: जो शरण लेने योग्य हैं, जो सब मंगलों में मंगल रूप हैं, जो पुरुषार्थ सिद्ध करने वाली हैं, उन कल्याणमयी नारायणी देवी को हमारा बारंबार नमस्कार है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण बिंदु जानकारी
भजन का नाम तेरा लख-लख शुक्र करां (Tera Lakh Lakh Shukar Kara)
समर्पित देवी/देवता मां झंडेवाली / मां दुर्गा / आदि शक्ति
मुख्य भाव शुकराना (कृतज्ञता), शरणागति, समर्पण (Bhakti & Gratitude)
भाषा पंजाबी मिश्रित हिंदी (Punjabi-Hindi)
उपयुक्त अवसर नवरात्रि, माता की चौकी, जगराता, दैनिक संध्या आरती
मुख्य संदेश अहंकार का त्याग और ईश्वर की कृपा के प्रति धन्यवाद

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश 'शुकराना' यानी कृतज्ञता है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में जो कुछ भी मिला है, उसके लिए ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए और अहंकार से दूर रहना चाहिए।

यह भजन मुख्य रूप से मां झंडेवाली (मां दुर्गा का स्वरूप) को समर्पित है, जिनका प्रसिद्ध मंदिर दिल्ली में स्थित है।

इसका अर्थ है कि मां ने भक्त को उसकी कर्मगत योग्यताओं और सामर्थ्य से कहीं अधिक सुख, सम्मान और आध्यात्मिक शांति प्रदान की है।

इसे नवरात्रि, माता के जगराते, चौकी या दैनिक संध्या आरती के समय गाना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।

हाँ, इस भजन के भाव इतने सार्वभौमिक हैं कि कई भक्त "मां झंडेवालिये" के स्थान पर "मेरे दाता जी" या "मेरे सतगुरु जी" शब्द का प्रयोग करके भी इसे गाते हैं।

इसका आध्यात्मिक अर्थ है कि अज्ञानता और सांसारिक मोह-माया के अंधकार (फर्श) से निकालकर ज्ञान और भक्ति के उच्च शिखर (अर्श) पर स्थापित करना।

इस भजन की भाषा पंजाबी मिश्रित हिंदी है, जो इसे अत्यंत सरल, सुमधुर और लोक-प्रिय बनाती है।

शुकराना करने से साधक का हृदय शुद्ध होता है, शिकायतें समाप्त होती हैं और वह ईश्वर की इच्छा में प्रसन्न रहना सीख जाता है, जो कि भक्ति की सर्वोच्च अवस्था है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को सनातन धर्म की प्रामाणिक संकीर्तन परंपरा, देवी भागवत के सिद्धांतों और लोक-भक्ति के मानदंडों के अनुसार संकलित और विश्लेषित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को भजन के केवल शब्दों से ही नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे गहरे आध्यात्मिक मर्म से भी परिचित कराना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्देवीभागवत महापुराण - मां दुर्गा की महिमा और शरणागति प्रसंग।
  • श्री दुर्गा सप्तशती - शुकराना और स्तुति मंत्र।
  • उत्तर भारतीय लोक भजन एवं संकीर्तन संग्रह।

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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