भक्ति काव्य व भजन बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

तोसे यु मंदिर न छूटे मोसे ये घर बार लिरिक्स (tose yoo mandir na chhoote mose ye ghar baar lyrics in hindi)

तोसे यु मंदिर न छूटे मोसे ये घर बार भजन के लिरिक्स हिंदी में पढ़ें। गृहस्थ और भक्ति के सुंदर संतुलन को दर्शाते इस भजन का भावार्थ और महत्व भी जानें।

प्रस्तुत भजन "तोसे यु मंदिर न छूटे मोसे ये घर बार" (Tose Yoo Mandir Na Chhoote Mose Ye Ghar Baar) सनातन भक्ति परंपरा का एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और दार्शनिक गीत है। यह भजन गृहस्थ जीवन और आध्यात्मिक साधना के बीच एक सुंदर संतुलन स्थापित करने की मानवीय आकांक्षा को दर्शाता है। इसमें भक्त और भगवान के बीच के मधुर संबंध, समर्पण भाव, और विनय रस की पराकाष्ठा देखने को मिलती है। इस भजन का मुख्य स्वर यह है कि यदि ईश्वर स्वयं भक्त के हृदय और घर में निवास करने आ जाएं, तो सांसारिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए भी जीवन एक पावन मंदिर बन जाता है। यह भजन विशेष रूप से शिरडी के साईं बाबा और अन्य आराध्य देवों के संकीर्तन में श्रद्धापूर्वक गाया जाता है। इसके माध्यम से भक्त अपने आराध्य से प्रार्थना करता है कि उसका घर ही मंदिर बन जाए ताकि उसे कभी भी अपने प्रभु से दूर न होना पड़े।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

तोसे यु मंदिर न छूटे मोसे ये घर बार,
हम दोनों को वो मिल जाये जिसको जो दरकार।
अगर तू घर आ जाये तो घर मंदिर बन जाये...

मंदिर तुम्हारा बाबा घर है हमारा,
बदले न मंदिर घर में नियम है तुम्हारा।
पल दो पल दर्शन का बाबा है हमको अधिकार,
अगर तू घर आ जाये तो घर मंदिर बन जाये...

मंदिर पे तेरे बाबा हक़ न हमारा,
मगर मेरे घर पे बाबा हक़ है तुम्हारा।
वहाँ मिले छतर शृंगार यहाँ मिले परिवार,
हम दोनों को वो मिल जाये जिसको जो दरकार।
अगर तू घर आ जाये तो घर मंदिर बन जाये...

छत्तर सिंगसन बाबा नहीं किसी काम के,
दुनिया में डंके बजते साई के नाम के।
बिन छत्तर सिंगसन के भी रहोगे तुम सरकार,
हम दोनों को वो मिल जाये जिसको जो दरकार।
अगर तू घर आ जाये तो घर मंदिर बन जाये...

फर्क क्या पड़ेगा तुमको इधर और उधर में,
जो बात मंदिर में है वही बात घर में।
यहाँ तुम्हारे चरण पड़ेंगे वही लगेगा दरबार,
हम दोनों को वो मिल जाये जिसको जो दरकार।
अगर तू घर आ जाये तो घर मंदिर बन जाये...

घर को जो घर समझो तो बेटा बना लो,
घर को जो मंदिर समझो नौकर बना लो।
बनवारी बस सेवा चाहिए चाहिए तेरा प्यार,
हम दोनों को वो मिल जाये जिसको जो दरकार,
अगर तू घर आ जाये तो घर मंदिर बन जाये...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन गृहस्थ भक्त की उस आंतरिक कशमकश और अनन्य प्रेम को अभिव्यक्त करता है, जहाँ वह अपने सांसारिक दायित्वों (घर-बार) को छोड़े बिना अपने आराध्य की निरंतर सन्निधि चाहता है। भक्त कहता है कि हे प्रभु! न तो मैं आपके मंदिर को छोड़ सकता हूँ और न ही अपने इस घर-बार और परिवार की जिम्मेदारियों से विमुख हो सकता हूँ। ऐसी स्थिति में सबसे सुंदर मार्ग यही है कि हम दोनों को अपनी-अपनी अभीष्ट वस्तु मिल जाए—मुझे आपकी अनवरत सेवा मिल जाए और आपको मेरा निष्कपट प्रेम मिल जाए।

भक्त अपने आराध्य से अनुनय-विनय करता है कि यदि आप स्वयं मेरे इस साधारण से घर में पधार जाएं, तो मेरा यह घर ही पावन मंदिर में परिवर्तित हो जाएगा। मंदिर में तो आपका ऐश्वर्यशाली रूप विराजित है, जहाँ नियम-कायदे और मर्यादाएं हैं, परंतु मेरे घर में केवल आपका ही आधिपत्य होगा। भक्त कहता है कि मंदिर में आपको छत्र, सिंहासन और भव्य शृंगार मिलता है, लेकिन मेरे घर में आपको एक समर्पित परिवार मिलेगा जो आपकी सेवा के लिए सदैव तत्पर रहेगा। इस प्रकार, यह भजन बाह्य आडंबरों और भव्यता की तुलना में आंतरिक प्रेम, आत्मीयता और सेवा भाव को कहीं अधिक महत्वपूर्ण स्थापित करता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • गृहस्थ धर्म और भक्ति का समन्वय: यह भजन यह संदेश देता है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए संसार का त्याग करना अनिवार्य नहीं है। यदि मन में सच्ची श्रद्धा हो, तो गृहस्थ जीवन जीते हुए भी ईश्वर को अपने घर में आमंत्रित किया जा सकता है।
  • समर्पण और वात्सल्य भाव: भजन की पंक्तियों में भक्त का भगवान के प्रति अनन्य समर्पण झलकता है। भक्त भगवान को अपने परिवार के सदस्य, पिता या पुत्र के रूप में स्वीकार करने को तैयार है।
  • आडंबरहीन भक्ति: भजन में स्पष्ट किया गया है कि भगवान को सोने के छत्र या सिंहासन की आवश्यकता नहीं है; वे तो केवल भक्त के प्रेम और भाव के भूखे हैं।
  • सरलता और सुगमता: इस भजन की भाषा अत्यंत सरल और हृदयस्पर्शी है, जिससे कोई भी सामान्य भक्त इससे तुरंत जुड़ जाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को गाने और सुनने के लिए किसी विशेष कठिन नियम की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह अत्यंत सरल और भावपूर्ण है। फिर भी, निम्नलिखित अवसरों पर इसका गायन विशेष फलदायी माना जाता है:

  • संध्या आरती व सत्संग: शाम के समय जब परिवार के सभी सदस्य एकत्रित हों, तब इस भजन का सामूहिक गायन करने से घर का वातावरण अत्यंत सकारात्मक और पवित्र बनता है।
  • गुरुवार की पूजा: चूंकि यह भजन शिरडी के साईं बाबा के भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है, इसलिए गुरुवार के दिन साईं बाबा की विशेष पूजा या साईं चालीसा के पाठ के बाद इसे गाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • गृह प्रवेश या पारिवारिक उत्सव: नए घर में प्रवेश करते समय या किसी मांगलिक कार्य के अवसर पर इस भजन को गाने से घर में सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से शिरडी के साईं बाबा को समर्पित करके गाया जाता है, जिन्हें करुणा, समरसता और सरल जीवन का प्रतीक माना जाता है। साईं बाबा ने सदैव अपने भक्तों को यही सिखाया कि ईश्वर हर कण में व्याप्त है और सच्चे मन से पुकारने पर वे भक्त के घर भी दौड़े चले आते हैं। इसके अतिरिक्त, इस भजन का भाव भगवान कृष्ण, भगवान राम या किसी भी अन्य इष्टदेव के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। भक्त अपने आराध्य को अपने जीवन का केंद्र मानकर इस भजन के माध्यम से उन्हें अपने घर आमंत्रित करता है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन के रचयिता सुप्रसिद्ध भजन गायक और लेखक 'बनवारी' जी हैं। उन्होंने अपने भजनों में सदैव सरल शब्दों के माध्यम से गूढ़ आध्यात्मिक सत्यों को उजागर किया है। इस भजन की पृष्ठभूमि भी इसी विचार पर आधारित है कि भक्त भगवान से दूर नहीं रह सकता और भगवान भी अपने सच्चे भक्त को तड़पता हुआ नहीं देख सकते। इसलिए, दोनों के बीच का यह अनूठा संवाद इस भजन के रूप में प्रस्फुटित हुआ है, जो आज देश-विदेश के अनगिनत मंदिरों और घरों में गूंजता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें लोकभाषा के शब्दों का बहुत ही सुंदर प्रयोग किया गया है। काव्य शैली संवादात्मक (Conversational) है, जिसमें भक्त सीधे अपने भगवान से बात कर रहा है। इसमें किसी भी प्रकार की क्लिष्टता नहीं है। 'दरकार', 'छतर', 'सिंगसन' (सिंहासन) जैसे शब्दों का प्रयोग इसे आम जनमानस के लिए अत्यंत सुगम बनाता है। इसमें प्रयुक्त रूपक अलंकार (जैसे घर को मंदिर बनाना) भजन के आध्यात्मिक सौंदर्य को और अधिक बढ़ा देता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें कई महत्वपूर्ण जीवन सीख देता है:

  • घर को मंदिर बनाएं: हमारे घर का वातावरण ऐसा होना चाहिए जहाँ क्रोध, ईर्ष्या और द्वेष के स्थान पर प्रेम, शांति और ईश्वर का स्मरण हो। तभी हमारा घर वास्तव में मंदिर बन पाएगा।
  • अधिकार की जगह कर्तव्य: भक्त कहता है कि मंदिर पर उसका अधिकार नहीं है, लेकिन भगवान का उसके घर पर पूरा अधिकार है। यह हमें सिखाता है कि भक्ति में अधिकार जताने के बजाय सेवा और समर्पण का भाव होना चाहिए।
  • सरल जीवन, उच्च विचार: भगवान को भौतिक सुख-सुविधाओं या सोने-चांदी के सिंहासनों से नहीं, बल्कि शुद्ध अंतःकरण से रिझाया जा सकता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ भजन के संदर्भ में महत्व
दरकार आवश्यकता / जरूरत भक्त और भगवान दोनों की अपनी-अपनी आध्यात्मिक आवश्यकताएं।
छतर (छत्र) देवताओं के सिर पर लगाया जाने वाला छत्र मंदिर की भव्यता और राजसी ठाट-बाट का प्रतीक।
सिंगसन (सिंहासन) राजगद्दी / देव आसन ईश्वर की सर्वोच्च सत्ता और मंदिर का वैभव।
अधिकार हक़ / दावा भक्त का मंदिर में सीमित अधिकार, परंतु घर में भगवान का असीमित अधिकार।
बनवारी भजन के रचयिता का नाम / कृष्ण का एक नाम कवि का आत्म-समर्पण और सेवा की याचना।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

1. "तोसे यु मंदिर न छूटे मोसे ये घर बार..."
भक्त कहता है कि हे प्रभु! मेरी स्थिति ऐसी है कि मैं आपके मंदिर की भक्ति को भी नहीं छोड़ सकता और अपने इस संसार व परिवार की जिम्मेदारियों से भी मुंह नहीं मोड़ सकता। इसलिए हम दोनों के बीच ऐसा सामंजस्य हो जाए कि हम दोनों को वही मिल जाए जिसकी हमें आवश्यकता है।

2. "मंदिर तुम्हारा बाबा घर है हमारा, बदले न मंदिर घर में नियम है तुम्हारा..."
मंदिर आपका निवास स्थान है और यह घर मेरा है। लेकिन यदि आप मेरे घर आ जाएं, तो मेरे घर के नियम भी आपके मंदिर जैसे ही पवित्र और अनुशासित हो जाएंगे। वहाँ भी आपकी ही मर्यादा चलेगी।

3. "मंदिर पे तेरे बाबा हक़ न हमारा मगर मेरे घर पे बाबा हक़ है तुम्हारा..."
मंदिर तो सार्वजनिक है, वहाँ मेरा अकेले का कोई विशेष अधिकार नहीं है। लेकिन मेरा जो घर है, उस पर आपका पूरा अधिकार है। वहाँ आप अपनी इच्छा से रह सकते हैं और हमारे जीवन का संचालन कर सकते हैं।

4. "छत्तर सिंगसन बाबा नहीं किसी काम के, दुनिया में डंके बजते साई के नाम के..."
हे साईं बाबा! आपके लिए ये सोने के छत्र और सिंहासन कोई मायने नहीं रखते। आपकी महिमा तो निराली है और पूरे विश्व में आपके नाम का डंका बजता है। आप बिना किसी भौतिक सिंहासन के भी हमारे दिलों के राजा रहेंगे।

5. "फर्क क्या पड़ेगा तुमको इधर और उधर में, जो बात मंदिर में है वही बात घर में..."
ईश्वर के लिए मंदिर और घर में कोई भेद नहीं है। वे तो सर्वव्यापी हैं। भक्त कहता है कि जब आपके चरण मेरे घर में पड़ेंगे, तो मेरा घर ही आपका भव्य दरबार बन जाएगा।

6. "घर को जो घर समझो तो बेटा बना लो, घर को जो मंदिर समझो नौकर बना लो..."
भक्त अत्यंत विनम्रता से कहता है कि यदि आप मेरे घर को केवल एक साधारण घर समझते हैं, तो मुझे अपने बेटे के रूप में स्वीकार कर लीजिए। और यदि आप इसे अपना मंदिर मानते हैं, तो मुझे अपना सेवक या नौकर बना लीजिए। मुझे तो बस आपकी सेवा और आपका प्रेम चाहिए।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के समर्पण भाव को पुष्ट करने के लिए निम्नलिखित श्लोक का स्मरण किया जा सकता है, जो भगवान के प्रति पूर्ण शरणागति को दर्शाता है:

त्वमेव माता च पिता त्वमेव।
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव।
त्वमेव सर्वं मम देव देव॥

इसके साथ ही, शिरडी के साईं बाबा के इस पावन मंत्र का जाप भी अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है:

ॐ साईं रामाय नमः।
ॐ शिरडी वासाय विद्महे, सच्चिदानंदाय धीमहि, तन्नो साईं प्रचोदयात्॥

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम तोसे यु मंदिर न छूटे मोसे ये घर बार
मुख्य आराध्य शिरडी के साईं बाबा / भगवान विष्णु / सामान्य देव
भजन के रचयिता बनवारी जी
मुख्य भाव (Bhava) समर्पण भाव, विनय रस, वात्सल्य और प्रेम भाव
भाषा सरल हिंदी (खड़ी बोली)
गायन का उत्तम समय संध्या काल, गुरुवार की पूजा, पारिवारिक सत्संग
मुख्य संदेश गृहस्थ जीवन में रहते हुए ईश्वर को अपने घर में बसाना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

"तोसे यु मंदिर न छूटे" भजन के मुख्य लेखक कौन हैं?

इस अत्यंत लोकप्रिय और भावपूर्ण भजन के रचयिता प्रसिद्ध भजन लेखक और गायक 'बनवारी' जी हैं।

यह भजन किस देवता को समर्पित है?

यह भजन मुख्य रूप से शिरडी के साईं बाबा को समर्पित करके गाया जाता है, परंतु इसके भाव इतने सार्वभौमिक हैं कि इसे किसी भी आराध्य देव (जैसे कृष्ण या राम) के लिए गाया जा सकता है।

इस भजन का मुख्य आध्यात्मिक संदेश क्या है?

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि सच्ची भक्ति के लिए संसार का त्याग करना आवश्यक नहीं है। यदि भक्त के मन में सच्चा प्रेम और समर्पण हो, तो वह अपने घर को ही मंदिर बना सकता है।

भजन में 'छतर' और 'सिंगसन' का क्या अर्थ है?

भजन में 'छतर' का अर्थ देवताओं के ऊपर सुशोभित होने वाले छत्र से है और 'सिंगसन' का अर्थ सिंहासन से है। ये मंदिर के ऐश्वर्य और बाह्य आडंबरों को दर्शाते हैं, जिनकी तुलना में भक्त का प्रेम अधिक मूल्यवान है।

इस भजन को गाने के लिए कौन सा दिन सबसे उत्तम माना जाता है?

यद्यपि इसे प्रतिदिन गाया जा सकता है, परंतु साईं बाबा के भक्तों के लिए गुरुवार का दिन इस भजन के गायन और श्रवण के लिए विशेष रूप से उत्तम माना जाता है।

"घर को जो मंदिर समझो नौकर बना लो" पंक्ति का क्या अर्थ है?

इस पंक्ति में भक्त की परम नम्रता प्रकट होती है। भक्त कहता है कि यदि प्रभु उसके घर को अपना मंदिर स्वीकार करते हैं, तो वह उस मंदिर का सेवक या नौकर बनकर जीवनभर उनकी सेवा करने को तैयार है।

क्या इस भजन को गृह प्रवेश के समय गाया जा सकता है?

हाँ, गृह प्रवेश के शुभ अवसर पर इस भजन का गायन अत्यंत मंगलकारी माना जाता है, क्योंकि यह घर में ईश्वर के आगमन और वास की प्रार्थना करता है।

इस भजन में किस प्रकार की भक्ति का वर्णन है?

इस भजन में 'रागानुगा भक्ति' और 'सख्य व वात्सल्य भाव' का सुंदर मिश्रण है, जहाँ भक्त भगवान को अपने परिवार का हिस्सा बनाने की तीव्र इच्छा रखता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन की समीक्षा करते हुए हमारे विद्वानों ने यह पाया है कि यह गीत केवल एक पारंपरिक भजन नहीं है, बल्कि यह श्रीमद्भगवद्गीता के 'कर्मयोग' और 'भक्तियोग' के सिद्धांतों का एक व्यावहारिक उदाहरण है। यह गृहस्थों को बिना किसी ग्लानि के अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए ईश्वर से जुड़े रहने का एक अत्यंत सुगम मार्ग दिखाता है। इसकी प्रामाणिकता और शुद्धता को बनाए रखने के लिए इसके पाठ को मूल संकीर्तन परंपरा के अनुसार ही यहाँ प्रस्तुत किया गया है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • शिरडी साईं सत्चरित्र और पारंपरिक साईं भजन संग्रह।
  • भक्ति रसामृत सिंधु - रूप गोस्वामी (भक्ति के विभिन्न भावों के संदर्भ में)।
  • सनातन धर्म की गृहस्थ साधना पद्धति एवं भजन परंपरा।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 14 Oct 2026

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