radha bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

यही है वो द्वार राधे रानी का (Yahi Hai Wo Dwar Radhe Rani Ka Lyrics in Hindi ) - Radha Rani Bhajan By Govinda Sharma

यही है वो द्वार राधे रानी का भजन लिरिक्स हिंदी में पढ़ें। पंडित गोविंदा शर्मा द्वारा गाये इस पावन राधा रानी भजन का आनंद लें।

भक्ति और समर्पण की पावन धरा वृंदावन की कुंज-गलियों में गूंजने वाला भजन "यही है वो द्वार राधे रानी का" राधा-कृष्ण के अगाध प्रेम और वैष्णव संप्रदाय की सर्वोच्च भावना का प्रतीक है। प्रसिद्ध गायक पंडित गोविंदा शर्मा (राधा वल्लभास) द्वारा स्वरबद्ध यह भजन केवल एक संगतिकीय प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह जीवात्मा का परमात्मा और उनकी आह्लादिनी शक्ति श्री राधा रानी के चरणों में अनन्य समर्पण का जीवंत दस्तावेज है। हिंदू सनातन परंपरा और विशेष रूप से गौड़ीय एवं राधावल्लभी संप्रदाय में श्री राधा को भगवान श्रीकृष्ण की प्राण-प्रिया और उनकी समस्त शक्तियों का मूल स्रोत माना जाता है। जब कोई भक्त इस भजन का स्मरण करता है, तो उसका हृदय वृंदावन की पावन रज और निकुंजों के दिव्य अहसास से भर जाता है। सुबह की बेला में, संध्या वंदना के समय, या संतों की सत्संग मंडली में इस भजन का गायन-श्रवण साधक के मन को भौतिक संसार की विसंगतियों से मुक्त कर भगवद् प्रेम के सागर में डुबो देता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस पावन भजन के संपूर्ण बोल, इसका गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ, भावार्थ, गायन की विधि और जीवन दर्शन का गहन विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

स्थायी (मखड़ा):

यही है वो द्वार राधे रानी का,
जहाँ झुकता है मस्तक हर ज्ञानी का।
बरसाने की गलियों में गूंजे जो नाम,
वही धाम है प्यारे मेरे बांके बिहारी का धाम॥

अंतररा 1:

वृंदावन की कुंज-कुटीर में देखो जरा,
राधा नाम का जादू है छाया हुवा।
श्याम सुंदर भी जिसके इशारे पे नाचे,
उसी रानी का दर्शन है जीवन का सरमाय॥

अंतररा 2:

बिना राधा के मोहन अधूरे रहें,
राधा कहें तो घनश्याम दौड़े चले आएं।
प्रेम की ऐसी परिभाषा यहाँ पर रची,
भक्तों ने अपनी सुध-बुध यहाँ है खोई॥

अंतिम चरण (समापन):

गोविंदा गाए गुण राधे रानी के चरणन में,
मिल जाए ठिकाना हमें भी उसी भवन में।
राधे-राधे रटो जी दिन और रात प्यारे,
कट जाएंगे सारे भव बंधन तुम्हारे॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

प्रस्तुत भजन "यही है वो द्वार राधे रानी का" के माध्यम से साधक और आराध्य के बीच के उस अंतरंग संबंध को उजागर किया गया है जहाँ तर्क और ज्ञान समाप्त हो जाते हैं और केवल शुद्ध प्रेम (प्रेम-भक्ति) शेष बचती है। भजन की पहली पंक्ति—"यही है वो द्वार राधे रानी का, जहाँ झुकता है मस्तक हर ज्ञानी का"—यह संदेश देती है कि बड़े-बड़े वेदों के ज्ञाता, ऋषि, मुनि और ज्ञानी पुरुष भी जब बरसाने की उस पावन देहरी पर पहुँचते हैं, तो उनका सारा अहंकार गल जाता है और वे राधा रानी के चरणों में नतमस्तक हो जाते हैं। ज्ञान की पराकाष्ठा शुष्क मोक्ष प्राप्ति नहीं, बल्कि श्री राधा-कृष्ण के चरणों में अहैतुकी भक्ति है।

अगले पदों में पंडित गोविंदा शर्मा जी वृंदावन और बरसाने के निकुंजों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण, जो ब्रह्मांड के पालनहार और योगेश्वर हैं, वे भी श्री राधा रानी के प्रेम के अधीन हैं। वैष्णव दर्शन के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण अपनी आह्लादिनी शक्ति 'राधा' के बिना अपूर्ण हैं। 'राधा' नाम का स्मरण मात्र करने से श्यामसुंदर खिंचे चले आते हैं। भजन का यह आंतरिक भाव हमें यह सिखाता है कि जीवन में यदि ईश्वर को पाना है, तो प्रेम और समर्पण का मार्ग ही सबसे सुगम और श्रेष्ठ मार्ग है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की रचना ब्रज संस्कृति और प्रेम भक्ति (मधुर भाव) के सिद्धांतों पर आधारित है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • दैवीय संबंध: यह भजन जीव और ब्रह्म के बीच के मधुरतम संबंध को राधा-कृष्ण के माध्यम से परिभाषित करता है।
  • अहंकार का शमन: यह सिखाता है कि भौतिक ज्ञान का अहंकार श्री राधा की कृपा के आगे व्यर्थ है।
  • नाम-स्मरण की महिमा: 'राधे-राधे' नाम के जप को सभी संकटों और भव-बंधनों को काटने वाला महामंत्र बताया गया है।
  • सांस्कृतिक जुड़ाव: यह ब्रजमंडल, बरसाना और वृंदावन की पवित्र परंपराओं को जीवंत करता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भजन को पूरी तल्लीनता और शुद्ध उच्चारण के साथ गाने या सुनने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है:

  • उचित समय: ब्रह्ममुहूर्त (प्रातःकाल 4 से 6 बजे) या संध्या वंदना के समय इस भजन का श्रवण अत्यंत फलदायी होता है।
  • स्थान: घर के पूजा कक्ष में दीप प्रज्वलित करके अथवा किसी एकांत शांत स्थान पर आँखें बंद करके इसका मनन करना चाहिए।
  • मानसिक स्थिति: गाते समय मन में बरसाने की कुंज गलियों और श्री राधा-कृष्ण के दिव्य स्वरूप का ध्यान रखना चाहिए।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के केंद्र में जगत जननी श्री राधा रानी और उनके आराध्य भगवान श्री कृष्ण (बांके बिहारी / श्यामसुंदर) हैं। सनातन धर्म में विशेषकर निम्बार्क संप्रदाय, राधावल्लभी संप्रदाय और गौड़ीय वैष्णव परंपरा में श्री राधा को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। गायक पंडित गोविंदा शर्मा जी ने अपनी मधुर वाणी से राधा वल्लभास परंपरा की उस सुमधुर शैली को पुनर्जीवित किया है जो ब्रज के संतों की साधना पद्धति का मुख्य अंग रही है। ऐसे संतों और उनके भजनों के माध्यम से हम श्री हनुमान चालीसा और अन्य स्तोत्रों की तरह ही अपनी भक्ति की ऊर्जा को जागृत कर सकते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

भजन की रचना ब्रजभाषा के लोक-साहित्य और भावुक संकीर्तन परंपरा से प्रेरित है। पंडित गोविंदा शर्मा जी ने अपनी अनूठी गायन शैली में इसे पिरोया है। ब्रज के संतों का मानना है कि राधा नाम साक्षात रस है जो भक्त के अंतःकरण को सींच देता है। इस रचना की पृष्ठभूमि बरसाना की पावन पहाड़ियों, राधारानी मंदिर और वहाँ के सेवायत समाज की दैनिक संकीर्तन परंपरा से जुड़ी हुई है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा अत्यंत सरल, मधुर और प्रवाहमयी हिंदी-ब्रजभाषा मिश्रित है। इसमें रूपक अलंकार और भक्ति रस का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। शब्दों का चयन ऐसा है कि आम भक्त से लेकर उच्च कोटि का साधक भी इसके भाव से तुरंत जुड़ जाता है। 'द्वार', 'कुंज-कुटीर', 'भव-बंधन' जैसे शब्द इसके काव्य सौंदर्य को और अधिक प्रगाढ़ बनाते हैं।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें जीवन जीने के कई गहरे आध्यात्मिक पाठ पढ़ाता है:

  • समर्पण भाव: जीवन में अहंकार का त्याग करके ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण रखना चाहिए।
  • प्रेम की सर्वोच्चता: घृणा और द्वेष को छोड़कर प्रेम और करुणा को अपने स्वभाव में अपनाना चाहिए।
  • निरंतर नाम जप: कठिनाइयों और दुखों से उबरने के लिए 'राधे-राधे' नाम का निरंतर स्मरण करना चाहिए।
शब्द / पद सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
द्वार राधे रानी का श्री राधा रानी का मंदिर या शरण मोक्ष और परम शांति का एकमात्र मार्ग
कुंज-कुटीर वृंदावन के वनों में बनी पत्तों की कुटिया दिव्य साधना और एकांत भक्ति का स्थल
सरमाया पूंजी या अनमोल धन भक्ति और भगवान का प्रेम ही असली संपत्ति है
भव बंधन जन्म-मृत्यु के सांसारिक चक्र माया और कर्मों का जाल जिससे मुक्ति आवश्यक है

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

भजन की हर पंक्ति एक गहरा संदेश देती है। जब हम कहते हैं कि "यही है वो द्वार राधे रानी का, जहाँ झुकता है मस्तक हर ज्ञानी का", तो इसका अर्थ है कि बुद्धि का अहंकार जिस स्थान पर आकर समाप्त हो जाता है, वही श्री राधा का दरबार है। इसी प्रकार, "बिना राधा के मोहन अधूरे रहें" यह दर्शाता है कि ईश्वर की शक्ति उनकी प्रेम-शक्ति के बिना प्रकट नहीं हो सकती। जिस प्रकार सूर्य के साथ उसकी प्रभा जुड़ी होती है, उसी प्रकार कृष्ण के साथ राधा का अस्तित्व अभिन्न है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

श्री राधा रानी की महिमा का वर्णन करते हुए स्कंद पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में अनेक श्लोक आए हैं। उनमें से एक प्रसिद्ध श्लोक इस प्रकार है:

राधे कृष्ण पदारविन्द भजने सक्ता च ये मानवाः,
तेषां दर्शन मात्रेण पूताः स्युः सर्वदा मानवः॥

अर्थात: जो मनुष्य श्री राधा और कृष्ण के चरण कमलों के भजन में आसक्त रहते हैं, उनके दर्शन मात्र से समस्त मनुष्य पवित्र हो जाते हैं।

भजन की जानकारी विवरण
भजन का नाम यही है वो द्वार राधे रानी का (Yahi Hai Wo Dwar Radhe Rani Ka)
गायक / कलाकार पंडित गोविंदा शर्मा (राधा वल्लभास)
ाराध्य देवी-देवता श्री राधा रानी एवं भगवान श्रीकृष्ण
भाषा हिंदी / ब्रजभाषा
भक्ति भाव माधुर्य भाव, प्रेम, समर्पण और संकीर्तन
उपयुक्त अवसर दैनिक पूजा, राधाष्टमी, जन्माष्टमी, सत्संग और कीर्तन

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस प्रसिद्ध भजन के गायक पंडित गोविंदा शर्मा (राधा वल्लभास) हैं, जो अपनी अनूठी ब्रज शैली और सुमधुर संकीर्तन के लिए जाने जाते हैं।

इस भजन का मुख्य संदेश श्री राधा रानी के चरणों में अनन्य समर्पण, अहंकार का त्याग और नाम-स्मरण के माध्यम से भव-बंधन से मुक्ति पाना है।

इन भजनों को प्रातःकाल पूजा के समय, संध्या वंदना में, राधाष्टमी, जन्माष्टमी या किसी भी सत्संग और धार्मिक अनुष्ठान के दौरान गाया जा सकता है।

वृंदावन और बरसाना की कुंज-गलियों में इस प्रकार के भजन भक्तों को भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के नित्य विहार की अनुभूति कराते हैं।

हाँ, इस भजन को घर पर एकांत में या परिवार के साथ कीर्तन के रूप में पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ गाया जा सकता है।

राधा-कृष्ण का प्रेम किसी लौकिक स्वार्थ पर आधारित न होकर जीवात्मा और परमात्मा के पूर्ण मिलन तथा शुद्ध आत्म-समर्पण का प्रतीक है।

संत और गुरु ही हमें भगवान के चरणों तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं और हमारे मन से संसार की असत्य आसक्तियों को दूर करते हैं।

यह सामग्री सनातन धर्म की पारंपरिक भक्ति पद्धतियों, ब्रज साहित्य, संतों के वचनों और शास्त्रों के अध्ययन के आधार पर संकलित की गई है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख भक्तिलोक (BhaktiLok) के संपादकीय दल द्वारा सनातन धर्म, वैष्णव परंपरा और ब्रज संस्कृति के मानदंडों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को प्रामाणिक, भावपूर्ण और उपयोगी सामग्री प्रदान करना है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत सभी तथ्यों और अर्थों की गहन समीक्षा की गई है ताकि पाठकों को उच्चतम आध्यात्मिक संतुष्टि मिल सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • ब्रज के संत एवं संप्रदाय - पारंपरिक साहित्य एवं संकीर्तन संग्रह
  • स्कंद पुराण एवं ब्रह्मवैवर्त पुराण (राधा-कृष्ण माहात्म्य खंड)
  • गौड़ीय एवं राधावल्लभी संप्रदाय के पद और कीर्तन ग्रंथ
  • लोक संगीत एवं पंडित गोविंदा शर्मा जी के संकीर्तन आख्यान

संबंधित भजन एवं लेख

यदि आपको यह भजन और इसकी व्याख्या पसंद आई है, तो हमारे अन्य पावन लेखों को भी अवश्य पढ़ें:

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!